अब दीवाली पर नहीं दिखती कुम्हारों के चेहरों पर खुशियाँ

पुश्तैनी पेशा छोड़,पलायन करने पर हैं मजबूर

रिपोर्ट:-सतीश चंद्र 
वजीरगंज,गोण्डा।अब तो दिवाली पर भी कुम्हारों के चेहरों पर वह खुशी नहीं झलकती, जो  दशकों पूर्व इन मिट्टी के फन कारों के चेहरे चेहरे पर देखें जाती थी। उस दौर में यह हुनरमंद दीवाली आने के  महीनों पूर्व से ही मिट्टी के दीए रंग-बिरंगे खिलौने, कलश ,घंटी व मटके निर्मित करने की तैयारियों में जुट जाते थे। इन सामानों की दीपावली में खूब बिक्री होती थी, और इसी से वह वर्ष भर के लिए परिवार के जीवन यापन के लिए अनाज में पैसे जमा कर लेते थे। उस दौर की दिवाली इन परिवारों के लिए खुशियों का सौगात लेकर आती थी। समय बदला स्थितियां बदल गई आधुनिकता के इस दौर में दीपों का स्थान बिजली की झालरों ने ले लिया ।मिट्टी के रंग बिरंगे खिलौनों के स्थान पर प्लास्टिक व फाइबर व चीनी मिट्टी के खिलौने बाजार में आ गए ।जिससे मिट्टी के सामान बनाने वाले हुनरमंद दुर्दिन झेल रहे हैं । इनकी  आय बहुत कम रह गई है। जिससे यह वर्ष भर अपने परिवार का भरण पोषण भी नहीं कर सकते। अब इन्हें सरकारी इमदाद की जरूरत है। कुम्हार बिरादरी के  अधिसंख्य लोग अब इस पुश्तैनी पेशे को छोड़कर दूसरे धंधों की ओर पलायन कर रहे हैं ,क्षेत्र के हवेलिया, नेपाल पुरवा, पूरे डाढू ,करनीपुर के अपने पुश्तैनी पेशे में लगे परिवारों को कोई सरकारी मदद नहीं मिल रही जिससे क्षेत्र में कुम्हारी कला लुप्त हो रही है।
विकासखंड वजीरगंज के नेपाल पुरवा गांव के रामदास प्रजापति ने बताया कि मिट्टी के दीयों से बहुत अल्प आमदनी होती है जिससे वर्ष भर उनके परिवार का भरण पोषण नहीं हो सकता सरकार की ओर से कोई सहायता न मिलने से हम लोग मिट्टी के बर्तन आदि बनाने के लिए कुटीर उद्योग भी नहीं बना पा रहे हैं जिससे इस पुश्तैनी पेशे से उन्हें मुश्किल से 25 से 30,000 की आय होती है जिससे पूरे साल भर का खर्चा चलाना मुश्किल है।

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